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Sunday, September 4, 2011

मेरा सन्देश


 १

 मंजिल को निगाहों मे रखना |
अपनों से बड़ो का सम्मान करना|
बुरइयो से कोशो दूर रहना|
                                  परेशानियों को हस कर सहना|
जिन्दगी को एक मकशद देना|
असफलता को सीढ़ी समझना|
हर हाल मे आगे को बढ़ना|
बस मेरा आप से यही है कहना|
    २
आने वाले भविष्य का ,
                   आज है आप  सब|
सभलकर चलना
               गिरने का है डर|
मंजिल तुम्हारे कदम चूमेंगी,
               यार ठीक से पढाई तो कर|
            ३
मंजिल पाए आप 
                यही दुआ है हमारी|
सारी खुसिया मिले आपको ,
                 यही खुदा से फरियाद है हमारी|



रचनाकार -प्रदीप तिवारी
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Teacher




शिक्षक होकर भी शिक्षक के बारे मे ,
लिखते हुए मेरी कलम अटकने लगी|
शायद वो मूल बातो से कही भटकने लगी|
शायद शिक्षक ,शिक्षक नहीं,या शिष्य ,शिष्य नहीं,
या फिर गुरु शिष्य की परंपरा कही भटकने लगी|
फिर भी कहना चाहूँगा एक बात,
गुरु हो या शिष्य हो बस दोनों मे कर्त्तव्य निष्ठां हो |
आचार ,व्यव्हार से दोनों समर्पित हो,
सच्चाई ,ईमानदारी का पाठ सर्वोपरि हो|
राष्ट्र निर्माण ,समाज निर्माण मे आपका योगदान अतुलनीय हो|
बस यही अभिलाषा है मेरी आपका भविष्य ,
चन्द्रमा की सीतलता लिए सूर्य की तरह उज्जवल हो|

रचनाकार -प्रदीप तिवारी
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Saturday, September 3, 2011

fir bewafai


धूप की तपिस मे,
ठंडी छाओ थी|
गम के मौसम मे,
ख़ुशी की बहार थी|
मेरे अकेलेपन मे,
पूरी महफ़िल थी|
मेरे मृत जीवन मे
अमृत सुधा थी |
                             उसको पाके जीवन लगा था मै जीने|
                              पर क्यों फिर मार  दिया मुझे उसने|
                             क्यों  मारा उसने यूं  तड़पा कर हमें|
                              हम तो यूं ही जान दे देते उन्हें|
                                   

रचनाकार--प्रदीप तिवारी
                                      
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Friday, September 2, 2011

bewafai



उन्मुक्त गगन की आभा थी,
 न  कोई  मेरी सीमा  थी|
जग सारा अपना लगता था.
हर सपना सच्चा लगता था|
पास मेरे जब तू होती थी ,
हर लम्हा बस अपना था|
भूल गया था खुद को मै,
मै तो बस तेरा  था |
                                  भुला दिया तूने  मुझको,
                           कैद हो गया पिंजरे मे |
                           दूर गई जब से  तू  मुझसे ,
                           एक दर्द जगा है  सीने मे |
                            मुक्त प्रेम की आंधी को ,
                            कैद किया मैंने सीने मे|
                             तुझ बिन ये जग सूना है,
                              अब मजा नहीं है जीने मे|
                              

  रचनाकार-प्रदीप तिवारी
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my love




आशमा अपनी तुम उचाई बढा लो ,
हमें अपने हौशलो पर पूरा भरोशा है|

अंधेरो मई रह के देख रहे थे ,
कि  अंधेरो मे अभी तक दम कितना है|

दुशमनो कि पहचान थी हमें कब से,
पर देखना था मेरे दोस्त कि रजा क्या है|

मिटने का भी मजा लेते रहे हम,
कऊ  कि उनको  खुस  देखने का अलग ही मजा है|

हम कमजोर तो थे ही नहीं कभी ,
पर उनसे हरने का अपना मजा है |

यूं तो जिन्दगी अभी बहुत थी मरी ,
पर उनके लिए मरने का अलग ही मजा है |

समझ सकी ना वो मेरे जज्बातों को ,
मेरा जीवन फिर भी  उशमे फ़ना है|


रचनाकार -प्रदीप तिवारी
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Thursday, September 1, 2011

mai kalam hu




भेद भाव कोई बैर नहीं 
कोई भी मुझसे  गैर नहीं
सब के लिए अर्पित  हूँ
लेखन के लिए समर्पित हु.
ऐश्वर्य, धन ,का माध्यम हु
जीवन का मै अमृत हु
करना मुझे स्मभालकर उपयोग
दूंगी तुम्हे नाम और सोहरत दोनों का योग.
करना न मेरा दुरूपयोग
दूंगी तुमको  हरदम  सहयोग.



रचनाकार --प्रदीप तिवारी
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kalam




कलम का पुजारी हू.
कलम मेरी बंदगी.
कलम से ही है मेरी जिन्दगी.
ख़ुशी,गम,प्रेम,वियोग, 
मे है मेरी साथी.
जिस रस को सोचा मैंने मन मे.
उसको लिखा है इसने अछरो मे.
प्रेम मे प्रेम रस है.
वीरो का वीर रस है.
रशिको का स्र्यंगार रस है.
कविका का काव्य रस है.
मेरा तो यह जीवन रस है.
इसकी इसी महिमा पर
मेरा संपूर्ण जीवन समर्पित है.


रचनाकार --प्रदीप तिवारी
www.kavipradeeptiwari.blogspot.com
www.pradeeptiwari.mca@gmail.com