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Sunday, December 30, 2012


""""""""""" सहादत """"""""""""""""""""""""""""""
मेरा मौन भी अब जोर जो से कहने लगा है।
मेरी खामोसी को अब जहा समझने  लगा है।
तभी तो खड़े है लोग मेरे जाने के बाद भी ,
जानते हुए भी की  मेरा आना अब  मुमकिन नहीं ।
फिर भी न जाने ये युवा  जिद पर  क्यों अडा  है 
 ये अजीब  करवा है जो एक ओर ही चल पड़ा है।।।
करना हमें ही पड़ेगा ,लड़ना हमें ही पड़ेगा ,
अब सायद युवा भी अब ये समझाने लगा है ।।।
मेरी सहादत व्यर्थ नहीं गई ये देखकर ,
मेरी रूह को सुकून बड़ा है ,रूह को सुकून बड़ा है 
 रचनाकार --प्रदीप तिवारी 

Saturday, December 29, 2012

दामिनी के लिए दो शब्द



जिन्दगी को जीना अब उसे बोझ लगने लगा होगा \  
मरहम ही  अब उसे  चोट लगने लगा होगा ।
सोचा होगा उसने ,यहाँ बहुत राजनीती है मेरे जिन्दा रहने  में 
जिन्दगी से ही उसका भरोषा उठने लगा होगा  
छोड़ दिया होगा उसने  जिन्दगी की राह में चलना उसने  
उसको खुद का  जिन्दा रहने से ज्यादा खामोश रहना ही सही लगा होगा ,,,

रचनाकार -प्रदीप तिवारी 

Monday, December 24, 2012

डेल्ही की पीड़ित लड़की के लिए


अस्मत को मेरी लूटकर 
इज्जत को तार तार कर दिया।
खुशनुमा  थी जिन्दगी मेरी ,
उसे वो जहन्नुम कर गया ।
इस जहा में सारे मेरे अपने ही थे,
फिर ऐसा वो कैसे कर गया।
यही सोचा कर मैंने पूछा .
खता क्या थी जो तू इतनी बड़ी सजा दे गया।
जाते जाते वो मुझे लडकी कह गया।।
जाते जाते वो मुझे लडकी कह गया।।

रचनाकार ---प्रदीप तिवारी  

Wednesday, September 19, 2012

आम आदमी



हर सवाल में ही कई सवाल है ।

जवाब खुद बखुद फटे हाल है।

खजाने  की चाभी लुटेरो के पास है।

जनता रो रो हो रही बेहाल है। 

भ्रष्ट नेता बना हमारा सरताज है।

चोर ,लुटेरो और नेता में  बड़ी साठ गाठ है ।

पुलिस भी खड़ी हो रही इनके साथ है।

 महगाई से चारो ओर मचा हा हा कार है।

नेता कह रहे यही देश का विकास है।

राष्ट्र प्रेमी राष्ट्र द्रोही कहे जा रहे है। 

देश द्रोहियो की बड़ी ढाठ बाठ है।

आम आदमी फिर भी जी रहा प्रदीप 

इसमें सच में बड़ी ताज्जुब की बात है। 

इसमें सच में बड़ी ताज्जुब की बात है।



रचनाकार -प्रदीप तिवारी 

एक मुलाकात


आखो और इशारों से होती थी हमारी बात ,
पर किस्मत न करा रही थी हमारी मुलाकात ।
दिल ही दिल में मेरे  पल रहे थे ढेरो ख्वाब ।
पर उससे मिलने के लिए हिम्मत देती थी जवाब ।
मैंने एक दिन उस्से मिलने की हिम्मत दिखाई ।
उससे मिलने की एक दिन आस नजर आई ।
पर उससे मिलते ही मेरे पसीने छुट गए मेरे भाई ।
देखते ही  पता चला पूरा पीस ही डिफेक्टिव् है  ।
इसकी बाई आंख तो बाबा रामदेव की तरह फडकती है।
रुकरुक कर बोलना और चलने को,
 हम अबतलक समझाते थे उसका सरमाना ।
पर असल में तो उसकी जुबान और चाल दोनों अटकती है।
पता चला असल  तो में ये लड़की लकवे का शिकार है।
  जिसके कारण इसका जीना हुआ दुस्वार है।
इस हालात को देखकर मेरे प्यार का सुनामी शांत हो गया।
कुछ पल के लिए तो मै खुद  को ही हार गया।
अपने आप को सहेजकर मैंने अपना फर्ज अदा करने की गुजारिश।
उसने मुस्कुराकर कहा मौत मई मेरी मंजिल ,
तुम न बनो मेरी पथरीली राह के  मुशाफिर।
इन हालात मई भी वो मुस्कुरा रही थी ।
वो खुश है इसका वो मुझे झूठा एहसास दिला रही थी।
मई कुछ कह पता उसके पहले ही वो जहा छोड़ गई ।
जिन्दगी जीते है कैसे वो मुझे जाते जाते सिखा गई ।
जिन्दगी जीते है कैसे वो मुझे जाते जाते सिखा गई ।

रचनाकार -प्रदीप तिवारी

बिटिया

जब बिटिया छोटी बच्ची थी,तब पायल छनकती थी |

मेरे नजर न आने पर ,पापा पापा चिल्लाती थी |

खूब लडती थी वो मुझसे ,जब खाली  हाथ घर आता था |

उसकी एक मुस्कान से ,मेरी थकान दूर  हो जाता थी |

जब दिन भर  काम करके मै  लौट कर घर  आता था |

घोडा हाथी बनने की जिद करती ,फिर मुझ  पर सवारी करती थी |

मेरे दर्द और शिकन को ,वो दूर से जान  लेती थी |

मेरी बिटिया मेरे दर्द को ,दूर से पहचान लेती  थी |

कभी न कोई फरमाइश की ,मेरे हर टेंशन की वो  दवाई थी |

हसते खेलते न जाने वो कब बड़ी हो गई , 

गुड्डे के संग खेलते खेलते , वो शादी  कर के चली गई |

उसकी खट्टी मीठी बाते याद कर ,आसुओ  का सैलाब उमड़ आता  है |

न जाने कैसे उसी वक़्त उसका ,मेरे पास फोन चला आता है |

उससे शुख दुख जान  करके सुकून आ जाता है |

ये बिटिया भी न कितनी अजीब होती है|

हमारे दिल के कितने करीब होती है|

शायद इसीलिए हमें इतनी अजीज होती है | 
रचनाकार -प्रदीप तिवारी 

Thursday, August 23, 2012

इन्सान को इन्सान न समझते है हम 
मजहबी बातो में लड़ते है हमदम 
इतनी बात न समझ पाते है हम
लड़कर हम इनकी कुर्सी बचाते है हम 
नेते तो ऐसे बईमान होते है की 
हम जले तो रोटी शेक लेते है ये 
गड़े तो उस पर घर बना लेते है ये 
ये नेते तो ऐसे दरिन्दे है की 
जरूरत मे माँ की आबरू भी बेच देते है.ये .रचनाकार--प्रदीप तिवारी