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Wednesday, September 19, 2012

बिटिया

जब बिटिया छोटी बच्ची थी,तब पायल छनकती थी |

मेरे नजर न आने पर ,पापा पापा चिल्लाती थी |

खूब लडती थी वो मुझसे ,जब खाली  हाथ घर आता था |

उसकी एक मुस्कान से ,मेरी थकान दूर  हो जाता थी |

जब दिन भर  काम करके मै  लौट कर घर  आता था |

घोडा हाथी बनने की जिद करती ,फिर मुझ  पर सवारी करती थी |

मेरे दर्द और शिकन को ,वो दूर से जान  लेती थी |

मेरी बिटिया मेरे दर्द को ,दूर से पहचान लेती  थी |

कभी न कोई फरमाइश की ,मेरे हर टेंशन की वो  दवाई थी |

हसते खेलते न जाने वो कब बड़ी हो गई , 

गुड्डे के संग खेलते खेलते , वो शादी  कर के चली गई |

उसकी खट्टी मीठी बाते याद कर ,आसुओ  का सैलाब उमड़ आता  है |

न जाने कैसे उसी वक़्त उसका ,मेरे पास फोन चला आता है |

उससे शुख दुख जान  करके सुकून आ जाता है |

ये बिटिया भी न कितनी अजीब होती है|

हमारे दिल के कितने करीब होती है|

शायद इसीलिए हमें इतनी अजीज होती है | 
रचनाकार -प्रदीप तिवारी 

Thursday, August 23, 2012

इन्सान को इन्सान न समझते है हम 
मजहबी बातो में लड़ते है हमदम 
इतनी बात न समझ पाते है हम
लड़कर हम इनकी कुर्सी बचाते है हम 
नेते तो ऐसे बईमान होते है की 
हम जले तो रोटी शेक लेते है ये 
गड़े तो उस पर घर बना लेते है ये 
ये नेते तो ऐसे दरिन्दे है की 
जरूरत मे माँ की आबरू भी बेच देते है.ये .रचनाकार--प्रदीप तिवारी

Saturday, July 14, 2012


हम तो मुसाफिर थे प्रदीप  उन्होंने ही हमें हमसफ़र  चुन लियाजब छोड़ा साथ मैंने उनका उन्होंने बेवफा मुझे कह दिया ..

                                       रचनाकार प्रदीप  तिवारी 

Wednesday, April 25, 2012

   
 जिन्दगी को समझाना,

अब मुस्किल सा लगता  है ।

अकेला होता हु जब भी मै,

तब मुझे महफ़िल सा लगता है।

महफ़िलो मे होता  हु जब भी मै,

तभी सूनसान सा लगता है।

एक पल जो  अपना सा लगा था कभी ,

अब वही  मुझे पराया सा  लगता है।

 जो  कही  बहुत दूर  है  मुझसे ,

वही  मुझे अपना सा लगता है।

जब भी हसने को दिल चाहता है ,

तभी  मेरा मन उदासा सा लगता है।

कभी मौत से तार्रुफ़ होता है तो,

लगता है अभी तो जीना बाकि है।

जब जीने की चाह होती है,

तब मौत में कुछ खास सा लगता है।

दोस्तों न जाने क्यु मेरा मन 

आजकल बहुत उदास सा लगता है....

..

रचनाकार =प्रदीप तिवारी
     
www.kavipradeeptiwari.blogspot.com
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Tuesday, March 13, 2012

माँ


भुला दिया उसने उसी को. 
जिन्दगी को नई जिन्दगी दी जिशने .
जीवन तक लगा दिया उसे लाने  मे.
फिर भी भूल गया तू किसी और के आने से.
हर तरफ सिर्फ खुसिया दी  जिशने  .
फिर गम क्यों है उसके आशियाने मे.
 मरहम  बना दिया खुद को जिशने 
फिर दर्द   इतना क्यों उसके सीने  मे.
दर्द को हरा कर खुसी दी  जिशने
फिर खुसी क्यों नहीं उसके नसीब मे.
प्रदीप कहता है माँ का जीवन है सायद ऐसा
वरना माँ तो बनाती है सपूत उसे
पर होते न कपूत इस जहांन  मे ..
रचनाकार...प्रदीप तिवारी 

Tuesday, March 6, 2012

होली की सुभकामनाये


अबकी होली ऐसे रंगों..
मन प्रीत  से रंग  जाये.
रहे न एको मन मे बैर..
बस प्रेम मिलन हो जाये..
रंगों तन को ऐसे की
मन भी रंगा रंग हो जाये..
धुले भले ही तन से रंग..
पर प्रीत बसी रह जाये...
खो के भाई चारे मे....
साद एक दूजे के हो जाये..
छूटे चाहे जग सारा.. 
पर प्रीत न छूटने पाए..
         
रचनाकार --प्रदीप  तिवारी
.kavipradeeptiwari.blogspot.com
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Thursday, March 1, 2012

mohbbat?????

jindgi bhar tanha rahe kyo ki kisi aur ka sath manjoor na tha...
kawahiso ko hi mar diya hamne kau ki unme tera na noor tha...
jindgi ke rasto ko mod diya teri khushiya ki taraf..
 kau ki meri jindgi ko teri kushi ke alwa kuchha aur na manjoor tha...
dilo halat ko batlana to tughe jarur tha.....
par rok liya khud ke jajabato ko ..kau ki tri jindgi mai koi aur tha........rachanakar..pradeep tiwari
kavipradeeptiwari.blogspot.com